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Pooja Mehta Aipan Arts
फोटो देवभूमि दर्शन

UTTARAKHAND SELF EMPLOYMENT

नैनीताल

नैनीताल की पूजा का हुनर है काबिले तारीफ गोबर पर ऐपण उकेरकर बनाती हैं खूबसूरत उत्पाद…

Pooja Mehta Aipan Arts: पूजा ऐपण कला को दे रही हैं नया आयाम, व्यर्थ पड़े रहने वाले गाय के गोबर का भी कर रही सदुपयोग….

Pooja Mehta Aipan Arts
तू न थकेगा कभी,

तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
महान कवि हरिवंश राय बच्चन की इस प्रसिद्ध कविता की चंद पंक्तियों को उत्तराखंड के क‌ई होनहार युवा आज सार्थक सिद्ध कर रहे हैं। बात हो रही है अपने गांव अपने पहाड़ में रहकर ही स्वरोजगार के न‌ए न‌ए तरीके अपनाने वाले उत्तराखण्ड के मेहनतकश युवाओं की, जो न केवल अपनी काबिलियत के दम पर अपनी आजीविका चला रहे हैं बल्कि अपने बुलंद हौसलों से बेकार समझे जाने वाली पहाड़ की क‌ई चीजों का भी सदुपयोग कर रहे हैं। यहां तक कि पहाड़ के क‌ई युवाओं ने गाय के गोबर को भी अपने स्वरोजगार का जरिया बना लिया है। आज हम आपको राज्य की एक और ऐसी ही होनहार बेटी से रूबरू कराने जा रहे हैं जो अपनी रचनात्मकता से गोबर से क‌ई उत्पाद बना रही है। इतना ही नहीं वह कुमाऊं की लोक विरासत ऐपण को भी सहेजने के लिए प्रयासरत हैं। जी हां… हम बात कर रहे हैं मूल रूप से राज्य के नैनीताल जिले के तवालेख गांव की रहने वाली पूजा मेहता की, जिन्होंने न सिर्फ कुमाऊं की लुप्त होती ऐपण कला को स्वरोजगार का माध्यम बनाया है बल्कि वह गाय के गोबर से भी क‌ई न‌ए न‌ए उत्पाद बना रही है।

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देवभूमि दर्शन से खास बातचीत:-

देवभूमि दर्शन से खास बातचीत में पूजा ने बताया कि उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा क्षेत्र के ही सरकारी विद्यालय राजकीय इंटर कॉलेज ढोकने से ग्रहण की। तदोपरांत उन्होंने सोबन सिंह जीना परिसर अल्मोड़ा से स्नातक की डिग्री हासिल की। स्नातक के बाद वह चाहती तो राज्य के अधिकांश युवाओं की तरह नौकरी के लिए शहरों की ओर रूख कर सकती थी। परंतु उन्होंने इसके बजाय अपने गांव में रहकर ही कुछ करने का संकल्प लिया। काफी सोच विचार करने के उपरांत उन्होंने दो वर्ष पहले कुमाऊं की लोक विरासत ऐपण को स्वरोजगार के रूप में अपनाने का फैसला किया। पूजा बताती है कि उन्होंने ऐपण की बारीकियां अपनी मां और दीदी से सीखी है। उन्होंने ऐपण को स्वरोजगार का जरिया इसलिए भी बनाया ताकि वह न केवल कुमाऊं की इस लोक विरासत को सहेज सके बल्कि कुमाऊं की इस लुप्त प्राय होती प्राचीन धरोहर को अधिक से अधिक लोगों तक भी पहुंचा सके । आपको बता दें कि एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाली पूजा के पिता स्वर्गीय दान सिंह मेहता के पश्चात उनकी मां भगवती मेहता पर ही परिवार कि सारी जिम्मेदारी आ गई। वह खेती-बाड़ी कर परिवार की आजीविका चलाती है।‌ परिवार की इन विषम परिस्थितियों के बावजूद पूजा स्वरोजगार के माध्यम से अपने परिवार को आर्थिक संबल भी प्रदान कर रही है। जो कि वाकई काबिले तारीफ है।

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Pooja Mehta self employment
करीब एक वर्ष तक कड़ी मेहनत के बाद जब उन्हें इसमें सफलता मिलने लगी तो उन्होंने ऐपण का उपयोग कर कुछ अलग करने की सोची और वह गाय के गोबर से उत्पाद बनाने पर शोध करने लगी, ताकि कुछ अलग एवं ईको फ्रेंडली उत्पाद दुनिया के सामने रख सकें। पूजा ने बताया कि छः महीने की कड़ी मेहनत के बाद अब वह गाय के गोबर से अच्छे-अच्छे उत्पाद बना रही है, जो ना केवल देखने में काफी सुंदर लगते हैं बल्कि पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण इन्हें बनाने या उपयोग करने से प्रकृति को भी कोई नुक़सान नहीं होता और पहाड़ में बेकार पड़े रहने वाले गाय के गोबर का भी सदुपयोग होता है। वह कहती हैं कि गाय के गोबर से अब तक वह कोस्टर, दिये, घड़ी, ओम, स्वास्तिक, राखी एवं भारत का नक्शा बना चुकी है तथा उनका यह प्रयास लगातार जारी है। वह कहती हैं कि छह महीने तक काफी शोध एवं प्रयोग करने के उपरांत उन्होंने गाय के गोबर से अपने पहले उत्पाद के रूप में कोस्टर का निर्माण किया। जिसके लिए उन्होंने गाय के गोबर में मिट्टी और पेड़ से निकलने वाले गोंद को गूंथकर कोस्टर बनाया। अपने इस उत्पाद को सुंदरता प्रदान करने के लिए उन्होंने इसके ऊपर गेरू मिट्टी का लेप लगाकर उसमें ऐपण बनाए। जिसके उपरांत वह इसी तरह गाय के गोबर से अन्य उत्पाद तैयार कर रही है।
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