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उत्तराखण्ड पहाड़ी गैलरी

प्रोफेसर अरविंद सिंह रावत का नया पहाड़ी गीत “हिमला” रिलीज होते ही छा गया

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सामाजिकता और संस्कृति को जिंदा रखने के लिए लोकगीतों/लोकसंस्कृतियों का सहेजा जाना बहुत जरूरी है, जिसके लिए आज उत्तराखण्ड के बहुत से कलाकार प्रयासरत है। वैसे तो हम आपको उत्तराखण्ड के अनेक कलाकारों से आए दिन परिचित करते रहते है, लेकिन आज हम एक ऐसे विशेष कलाकार से आपको रूबरू कराने जा रहे है जो पेशे से जरूर प्रोफेसर है लेकिन उनका मन और चित्त पूरी तरह से संगीत और लेखनी से बद्ध है। अरविन्द अपने गायन और लेखन के जरिए उत्तराखंडी लोकसंगीत को एक नयी पहचान दिलाने में लगातार प्रयासरत हैं, साथ ही अपनी उत्कृष्ट गायन शैली से पहाड़ी लोकसंस्कृति को भी संजोये हुए है। पेशे से उत्तराँचल विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्यूनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर पद पर कार्यरत अरविन्द लोकगीत एवं गढ़वाली गीत-संगीत की उम्दा समझ रखने के साथ साथ गायिकी की बारीकियों को भी भली भांति समझते है। इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक, एमटेक और फिर पीएचडी करने के बाद भी संगीत कला क्षेत्र ने उन्हें अपनी ओर मोड़ ही लिया। देवभूमि दर्शन से खाश बात चित में प्रोफेसर अरविन्द बताते हैं कि बचपन से ही उन्हें संगीत में गहन रूचि थी।




“हिर हिमला हाथ्यूं की हरी चूड़ी हरिगे मेरी जिकुडी ता छुम” गीत के बोल देख और सुन के ही आप उनकी रचनात्मकता का अंदाजा लगा सकते है की किस तरह से लोककलाकार अरविन्द सिंह रावत ने “ह” शब्द से अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग करते हुए गीत की रचना की है। जितने सुंदर बोल उतने ही सुन्दर गायन, फिल्मांकन एवं संगीत।  बता दे की इस से पहले भी प्रोफेसर अरविन्द रावत कई गढ़वाली गीत लिख और गा चुके हैं जिनमे काजल को घेरो ,साथ माया को ,साथ छोड़ी जै न ओर बिनसिरि बिटी प्रसिद्ध गीत है। बताते चले की इस से पहले बिनसिरि बिटी में लोककलाकार अरविंद सिंह रावत और लोकगायिका मीना राणा की जुगलबंदी देखने को मिली और जिसको लोगो दवारा काफी पसंद किया गया। इस खूबसूरत गीत में अभिनय किया है अर्जुन रावत और ऐश्वर्या बडोला ने वही गीत का निर्देशन किया है विजय भारती ने। आशीष के बैकग्राउंड म्यूजिक ने जहाँ गीत में चार चाँद लगा दिए वही गीत की रचना भी स्वयं अरविन्द रावत ने ही की है। गीत को उनके यूटूब चैनल पर रिलीज किया गया है।




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