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Shamshad Pithoragarhi of uttarakhand aipan Artist

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उत्तराखंड: शमशाद पिथौरागढ़ी ने ऐपण कला को दी विशेष पहचान संगीत जगत में भी रहा विशेष योगदान

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Shamshad Pithoragarhi aipan Artist: बीते 29 वर्षों पहाड़ की संस्कृति सभ्यता में अपनी चित्रकला का रंग भर रहे हैं शमशाद, कर रहे हैं पहाड़ की लोक विरासत को सहेजने का काम….

Shamshad Pithoragarhi aipan Artist
उत्तराखंड की संस्कृति हमेशा से ही देश विदेश के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है। जहां एक ओर आज पहाड़ के अधिकांश युवा अपनी सभ्यता एवं संस्कृति से मुंह मोड़ कर पश्चिमी सभ्यता अपना रहे हैं वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पहाड़ की सभ्यता संस्कृति को बचाने में अपनी अद्वितीय पहल से न केवल इसे देश विदेश तक पहुंचा रहे है बल्कि वह लगातार इसे बचाने के लिए सराहनीय पहल भी कर रहे हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही युवा से रूबरू कराने जा रहे हैं जो बीते 29 वर्षों से राज्य के सीमांत जिले पिथौरागढ़ में रहकर यहां की लोक परम्पराओं में रंग भरने का कार्य कर रहे हैं। जी हां.. हम बात कर रहे हैं उत्तराखंडी सांस्कृतिक चित्रकार शमशाद पिथौरागढ़ी की, जिनके लिए यह कहना बिल्कुल भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि “एक पहाड़ी ऐसा भी” जिसने धर्म, जाति, घर परिवार को एक तरफ रख अपना पूरा जीवन उत्तराखंड की संस्कृति को आगे ले जाने में उसे बढ़ाने में उसके प्रचार-प्रसार में समर्पित कर दिया है।
उत्तराखंड: शमशाद पिथौरागढ़ी ने ऐपण कला को दी विशेष पहचान संगीत जगत में भी रहा विशेष योगदानयह भी पढ़ें- पूजा ने अपने हुनर से ऐंपण कला को बनाया स्वरोजगार का जरिया, देश-विदेशो से हो रही डिमांड

देवभूमि दर्शन से खास बातचीत:-

Shamshad Pithoragarhi uttarakhand
देवभूमि दर्शन से खास बातचीत में उत्तराखंडी सांस्कृतिक चित्रकार शमशाद पिथौरागढ़ी बताते हैं कि उनका जन्म तो चमोली जिले में हुआ था परंतु उन्होंने अपना प्रारंभिक जीवन पिथौरागढ़ से ही शुरू किया था। यहीं उनकी शिक्षा दीक्षा हुई। पिथौरागढ़ में वह तिलढुकरी वार्ड में रहते थे। यहीं रहकर वे नवोदय पर्वतीय कला केंद्र के सम्पर्क में आए और उन्होंने उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को समझना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने पहाड़ की लोक विरासत छलिया नृत्य, पर्वतीय क्षेत्र के परिधान, गहने, ऐंपण, वाद्य यंत्र, हिलजात्रा को अपनी पेटिंग का विषय बनाया। पिथौरागढ़ में कुछ साल रहने के बाद दो दशक पूर्व वे हमेशा के लिए लखनऊ जा बसे परंतु फिर भी उत्तराखंड से लगाव व मोह कम नहीं हुआ, यही कारण है कि वह आज ही पहाड़ की संस्कृति पर ही कार्य कर रहे हैं। वे नवोदय पर्वतीय कला केंद्र के निदेशक हेमराज बिष्ट को अपना गुरु मानते हैं। वे बताते हैं कि वर्ष 1995 में उनसे पहला कार्य छलिया महोत्सव पिथौरागढ़ के मंच पर हेमराज सिंह बिष्ट ने करवाया था, जिसे वे आज भी जारी रखें हुए हैं।
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आपको बता दें कि बीते आज तीन दशकोंं से शमशाद लगातार उत्तराखंड की संस्कृति पर पेंटिंग बनाकर कार्य कर रहे हैं जिसमें हिलजात्रा, छलिया, ऐपण व कई सारी उत्तराखंड की ऐसी संस्कृति है जिनको आज की युवा पीढ़ी भूल चुके हैं । इनमें से कुछ तो विलुप्त प्राय होने की कगार पर है लेकिन शमशाद ने उनको अपने रंगों के माध्यम से पेंटिंग बनाकर उनको जीवित रख देश के कोने कोने से लेकर विश्व पटल पर रखा है। इतना नहीं देश के अलग-अलग राज्यों के कई मुख्यमंत्रियों, ग्रह मंत्री , राज्यपाल से लेकर बड़े से बड़े राजनेताओं , फिल्म इंडस्ट्री के बड़े से बड़े सितारों, गायकों, बासुंरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया तक को वह उत्तराखंड की संस्कृति ऐपण को अपनी कलाकृति में उतारकर भेंट किया है। शमशाद को उनके कार्य के लिए बड़े बड़े आयोजनों महोत्सव, मेलों में ऐपण प्रदर्शनी के लिए कई सम्मान, व पुरस्कार मिल चुके हैं, जिसमें हाल ही में खटीमा में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कुमाऊं सांस्कृतिक उत्थान मंच पर उत्तराखंड कला सम्मान 2023 से सम्मानित किया।
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Shamshad Pithoragarhi aipan Artist
इतना ही नहीं भारत सरकार द्वारा रजिस्ट्रर्ड स्वच्छ भारत अभियान, डिजिटल इंडिया के तहत शमशाद को भोपाल में सम्मानित किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त उन्हें भारत भूषण सम्मान 2022, देवभूमि लोक सम्मान, ब्रिटेन से वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, ओमजी नेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, हिमालयन सम्मान जैसे सैकड़ों पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। आपको बता दें चित्रकारी के जरिए पहाड़ी सभ्यता संस्कृति को सहेजने के साथ ही शमशाद ने कुमाऊनी बोली भाषा का भी बहुत प्रचार प्रसार किया है यहां तक कि शमशाद ने कुमाऊनी गढ़वाली में अभी तक 15 से 20 गीत लिखे हैं, जिन्हें उत्तराखंड के क‌ई सुप्रसिद्ध गायक गायिकाओं ने अपनी मधुर आवाज दी और इनमें से क‌ई गीत सुपर हिट भी हुए हैं। जिनमें…

  • पनार की बाना
  • बाबु ब्वारी खोज
  • हिट नेह जानू उतरायणी
  • भली लगी रै ब्योली
  • तेरी ईजा बीमार छ
  • ठुली ईजा मेरी सुन जरा
  • नौ पटे घाघेरी
  • चार तौला नथुली
  • धारचुला की बाना
  • पहाड़ घूमी ले
  • ना तोड़े डिंडयाली
  • कतु भलो मिजात आदि गीत शामिल हैं।

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