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Uttarakhand marriage: पहाड़ में शादी बनी परेशानी, 37–47 की उम्र तक नहीं मिल रही दुल्हन
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Uttarakhand Marriage become a problem, bride are not available till the age of 37-47 youth waiting news today: 37 से 47 की उम्र में भी कुंवारे रह गए पहाड़ के बेटे, दुल्हन की तलाश बना परिवारों की सबसे बड़ी चिंता
Uttarakhand Marriage become a problem, bride are not available till the age of 37-47 youth groom waiting news today: उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों की शांत वादियों में एक ऐसी सामाजिक पीड़ा गहराती जा रही है, जिस पर अब तक खुलकर बात कम हुई है। जी हां… पहाड़ में शादी के लिए दुल्हन ना मिलना आज एक विशाल सामाजिक समस्या बन गई है , जिस कारण जहां हजारों युवा कुंवारे रहने को मजबूर हैं वहीं उनके परिजनों में मानसिक तनाव बढ़ रहा है। खासतौर पर उत्तराखण्ड के सीमांत जिलों में 37 से 47 वर्ष की उम्र पार कर चुके कई युवक आज भी विवाह के इंतज़ार में हैं। जिस उम्र में कभी माता-पिता अपने बच्चों के रिश्ते तलाशते थे, आज उसी उम्र में बेटे खुद अपने भविष्य को लेकर असमंजस में खड़े हैं। हालात ऐसे हैं कि तमाम कोशिशों के बावजूद परिजनों को बहुओं का चेहरा तक नसीब नहीं हो पा रहा।
यह स्थिति आज किसी एक परिवार या गांव तक सीमित नहीं है। पहाड़ में रोजगार के सीमित अवसर, सरकारी नौकरी का बढ़ता सामाजिक दबाव और मैदानी क्षेत्रों की ओर बढ़ती प्राथमिकता ने विवाह जैसी बुनियादी सामाजिक व्यवस्था को भी प्रभावित कर दिया है। स्थानीय स्तर पर मेहनत-मजदूरी या निजी काम करने वाले युवकों को विवाह योग्य मानने से कन्या पक्ष लगातार पीछे हट रहा है। आज ऐसे ही कुछ मामले राज्य के पिथौरागढ़ जिले से सामने आए हैं, जिनमें बारे में जानकर आप इस समस्या की गहराई और विशालता का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं।
केस–1: उम्मीद से हताशा तक का सफर
38 वर्षीय सोनू (परिवर्तित नाम) ने हाल ही में अपना जन्मदिन मनाया। बीते तीन-चार वर्षों से परिजन रिश्तों की खोज में जुटे रहे। कुछ जगह बात आगे भी बढ़ी, लेकिन शर्तें आड़े आ गईं। कहीं मैदानी इलाके में बसने की मांग थी तो कहीं संयुक्त परिवार से अलग रहने की। सोनू अब इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि शायद विवाह उनके जीवन का हिस्सा ही नहीं बनेगा।
केस–2: मां की चिंता और बेटे का अकेलापन
45 वर्षीय दीपक (परिवर्तित नाम) के पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। छोटे भाई ने वर्षों पहले प्रेम विवाह कर लिया, लेकिन दीपक की जिंदगी आज भी अधूरी है। घर में केवल बुजुर्ग मां हैं, जिनकी सबसे बड़ी चिंता बेटे का भविष्य है। मां की हर सुबह इसी उम्मीद के साथ शुरू होती है कि शायद आज कोई रिश्ता तय हो जाए।
केस–3: जहां उम्मीदें भी थक चुकी हैं
47 साल के प्रकाश (परिवर्तित नाम) के लिए तो अब परिवार ने भी विवाह की उम्मीद लगभग छोड़ दी है। हालात इतने बदतर हैं कि 42 वर्षीय छोटे भाई के लिए भी कन्या नहीं मिल रही। कारण वही—सरकारी नौकरी का अभाव। माता-पिता की आखिरी कोशिश बस इतनी है कि किसी तरह छोटे बेटे का घर बस जाए, ताकि वंश आगे बढ़ सके।
क्यों नहीं बन पा रहे रिश्ते?
इस संबंध में विवाह कार्यों से जुड़े पंडित नीरज जोशी मीडिया से बातचीत में बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में यह समस्या तेजी से बढ़ी है। 45 वर्ष से कम उम्र के कई युवक आज भी अविवाहित हैं, जबकि कुछ की उम्र 47 वर्ष तक पहुंच चुकी है। कन्या पक्ष की प्राथमिकताएं अब स्पष्ट हैं—सरकारी नौकरी, शहर में मकान और मैदानी जीवन। पहाड़ में रहकर निजी या अस्थायी काम करने वाले युवकों को सामाजिक स्वीकृति कम मिल रही है।
समाज के सामने खड़ा बड़ा सवाल
यह केवल विवाह का संकट नहीं, बल्कि पहाड़ के सामाजिक ताने-बाने पर मंडराता खतरा है। अगर यही हालात रहे तो आने वाले वर्षों में न केवल परिवार, बल्कि गांवों का अस्तित्व भी प्रभावित हो सकता है। सवाल यह नहीं कि दुल्हन क्यों नहीं मिल रही, बल्कि यह है कि क्या पहाड़ का जीवन और यहां के युवकों का संघर्ष अब भी समाज की नजर में उतना ही सम्मानजनक है? कुल मिलाकर यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि उन अनकहे दर्दों की आवाज़ है, जो पहाड़ के कई घरों में हर दिन चुपचाप पल रहे हैं।
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