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Harela 2026 Date: उत्तराखंड में कब मनाया जाएगा हरेला? कब बोएंगे और क्या है लोकपर्व का महत्व
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Harela festival date 2026: 16 जुलाई को मनाया जाएगा उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला, जानिए महत्व, परंपराएं और मनाने की संपूर्ण विधि
|Harela festival date 2026|उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में कई ऐसे लोकपर्व शामिल हैं, जो केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रकृति, खेती-किसानी और सामाजिक एकता का भी संदेश देते हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख पर्व हरेला है। यह पर्व हर साल श्रावण संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है। इस वर्ष 2026 में हरेला 16 जुलाई (गुरुवार) को मनाया जाएगा। इस दिन उत्तराखंड के गांवों से लेकर शहरों तक लोग भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं, हरेला काटते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल तथा प्रकृति की रक्षा का संकल्प लेते हैं।
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क्या है हरेला पर्व और क्यों मनाया जाता है? (Harela Festival Significance)
हरेला उत्तराखंड का सबसे महत्वपूर्ण लोकपर्व माना जाता है। यह पर्व वर्षा ऋतु, नई फसल, हरियाली और जीवन में नई शुरुआत का प्रतीक है। उत्तराखंड की लोक मान्यताओं के अनुसार श्रावण मास भगवान शिव का प्रिय महीना होता है। इसलिए श्रावण संक्रांति पर मनाया जाने वाला हरेला भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश को समर्पित होता है। कृषि प्रधान समाज में इस पर्व का विशेष महत्व है। किसान अच्छी वर्षा, भरपूर पैदावार और पशुधन की समृद्धि की कामना करते हैं। वहीं परिवार के लोग अपने घर की खुशहाली, स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। आधुनिक समय में हरेला पर्यावरण संरक्षण और पौधारोपण के संदेश के कारण भी पूरे उत्तराखंड में विशेष पहचान बना चुका है।
हरेला बोने की परंपरा कैसे निभाई जाती है? (Harela Sowing Ritual)
आपको बता दें कि हरेला पर्व की तैयारी लगभग 9, 10 या 11 दिन पहले शुरू हो जाती है। घर में किसी साफ स्थान पर लकड़ी की चौकी, बांस की टोकरी या मिट्टी के पात्र में शुद्ध मिट्टी डाली जाती है। इसके बाद शुभ मुहूर्त में गेहूं, जौ, धान, मक्का, उड़द, गहत, तिल और भट्ट जैसे पांच या सात प्रकार के बीज बोए जाते हैं। कई परिवार स्थानीय परंपरा के अनुसार बीजों की संख्या तय करते हैं। बीज बोने के बाद प्रतिदिन उन पर हल्का पानी छिड़का जाता है। कुछ ही दिनों में इनसे कोमल हरे अंकुर निकल आते हैं। इन्हीं हरे अंकुरों को हरेला कहा जाता है। यह हरियाली, समृद्धि, नई ऊर्जा और जीवन के विकास का प्रतीक माना जाता है।
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हरेला पर्व कैसे मनाया जाता है? (Harela festival Celebration)
हरेला त्योहार के दिन भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश की सुबह विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा पूरी होने के बाद उगे हुए हरेला को सावधानीपूर्वक काटा जाता है। घर के बड़े-बुजुर्ग परिवार के प्रत्येक सदस्य के सिर पर हरेला रखते हुए पारंपरिक आशीर्वाद देते हैं—
“जी रये, जागी रये, यो दिन यो बार भेटने रये।”
इस लोकआशीर्वाद का अर्थ है कि व्यक्ति स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु रहे तथा हर वर्ष यह शुभ पर्व देखने का सौभाग्य प्राप्त करे। इसके बाद हरेला को कुलदेवताओं, ग्राम देवताओं और मंदिरों में अर्पित किया जाता है। उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में लोग हरेला को अपने कानों के पीछे भी लगाते हैं, जिसे शुभता और मंगल का प्रतीक माना जाता है। इस दिन घर पर विशेष पकवान भी बनाए जाते हैं जिसमें पूरी के साथ गडेरी की सब्जी खीर इत्यादि पकवान शामिल रहते हैं।
प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है हरेला (Environment Conservation)
हरेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भी पर्व है। इस दिन पूरे उत्तराखंड में बड़े स्तर पर पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं। सरकारी विभाग, विद्यालय, सामाजिक संगठन और आम नागरिक पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हैं। बदलते जलवायु संकट और घटते वन क्षेत्र को देखते हुए हरेला का महत्व और भी बढ़ गया है। यह पर्व लोगों को पेड़-पौधों के महत्व को समझने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए प्रेरित करता है।
उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान है हरेला (Uttarakhand Culture)
कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों में हरेला का उत्सव अलग-अलग स्थानीय परंपराओं के साथ मनाया जाता है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य एक ही है—प्रकृति के प्रति सम्मान, परिवार की खुशहाली और समाज में सकारात्मकता का संदेश देना। यही कारण है कि हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। हर वर्ष आने वाला यह पर्व लोगों को अपनी जड़ों, कृषि परंपराओं और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारियों की याद दिलाता है। यही वजह है कि हरेला आज भी उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण लोकपर्वों में गिना जाता है।
