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Pithoragarh news: पिथौरागढ़ में महिला को कंधा देने वाला नहीं मिला SSB जवानों ने की अंत्येष्टि
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Pithoragarh breaking news: पहाड़ की पीड़ा बन चुका पलायन, महिला को कंधा देने के लिए भी नहीं मिल पाए चार लोग, SSB के जवानो ने किया महिला का अंतिम संस्कार..
Pithoragarh breaking news SSB Soldier rites old woman due to migration: पहाड़ दिखने में भले ही कितने ज्यादा खूबसूरत क्यों ना लगते हो ,लेकिन इस बात से मुँह नही मोड़ा जा सकता की पहाड़ इस खूबसूरती के पीछे कई सारे जख्म छुपाए बैठा है। पहाड़ में आज ऐसे कई सारे गांव मौजूद है ,जहां से भारी संख्या में पलायन हो चुका है इतना ही नहीं बल्कि उत्तराखंड में मौजूद गांव के गांव तक खाली हो चुके हैं। ऐसी ही कुछ कहानी है पिथौरागढ़ जिले की जहां एक बुजुर्ग महिला की मौत पर उसे कंधा देने के लिए गांव में चार लोग भी नहीं मिले।
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प्राप्त जानकारी के अनुसार पिथौरागढ़ जिले से 25 किलोमीटर दूर मूनाकोट ब्लॉक के तडीगांव की निवासी 100 वर्षीय झूपा देवी का बीते बुधवार को निधन हो गया। जिसके बाद बुजुर्ग महिला को अंत्येष्टि के लिए गांव से करीब ढाई किलोमीटर दूर काली नदी के तट तक ले जाया जाना था। लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि महिला की अंतिम यात्रा के लिए पर्याप्त लोग गांव में मौजूद ही नहीं थे जो उनकी अर्थी को कंधा दे सकते। गांव के पूर्व प्रधान ने बताया कि शव यात्रा के लिए गांव में सिर्फ चार-पांच लोग मिले वह भी उम्रदराज।
SSB के जवानो ने महिला की अर्थी को दिया कंधा ( pithoragarh news today)
विकट परिस्थिति को देखते हुए नेपाल सीमा पर तैनात SSB के जवानों से मदद मांगी गई जिस पर SSB के चार जवान और दो अधिकारी मदद के लिए पहुंचे। जवानों की सहायता से शव को काली नदी के तट पर ले जाया गया। SSB के जवान महिला की अंतिम संस्कार के लिए पहले लकडियां लेकर गए और फिर महिला का अंतिम संस्कार किया गया ,जहां 65 वर्षीय रमेश चंद ने अपनी मां की चिता को मुखाग्नि दी।
गांव में रह रहे सिर्फ बुजुर्ग लोग ( pithoragarh news breaking)
बताते चलें इस गांव में पलायन का प्रमुख कारण सड़क निर्माण में देरी और वन्य जीवों की दहशत है। वर्ष 2019 में पंचायत की बनवाई गई कच्ची सड़क अब तक पक्की होनी बाकी है। जंगली सूअर खेती को नष्ट कर रहे हैं इसके साथ ही वहां पर गुलदार और भालू की दहशत भी बनी रहती। गांव में 20 साल पहले 37 परिवार रहते थे लेकिन अब 13 परिवार ही गांव में रह रहे हैं जिनमें अधिकतर बुजुर्ग ही है।
