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Uttarakhand phool dei festival 2026 date in hindi breaking news today phuldei lokparava
Image : सांकेतिक फोटो ( Uttarakhand phool dei festival 2026)

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उत्तराखंड लोकपर्व फूलदेई त्यौहार 2026 Date | Phool dei Festival 2026 Hindi |

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Uttarakhand phool dei festival 2026: 14 और 15 मार्च को मनाया जाएगा उत्तराखंड का लोक पर्व फूलदेई त्यौहार

Uttarakhand phool dei festival 2026 date in hindi breaking news today phuldei lokparava: उत्तराखंड में यूं तो अनेकों लोक पर्व बढ़ी धूम धाम से मनाये जाते है। लेकिन उन्हीं लोक पर्वों मे से एक महत्वपूर्ण पर्व फूलदेई भी है जो विशेष रूप से बच्चों द्वारा मनाया जाता है इसलिए इसे लोक बाल पर्व भी कहा जाता है। इस वर्ष 2026 में यह पर्व 14 और 15 मार्च को मनाया जाएगा। बताते चले फूलदेई त्योहार बसंत ऋतु के आगमन का मधुर संदेश लेकर आता है जो गढ़वाल और कुमाऊं मंडल समेत जौनसार क्षेत्र में अलग-अलग रूप में मनाया जाता है।

यह भी पढ़े :Phool Dei Festival 2024: उत्तराखंड में फूलदेई त्यौहार 2024 कब है ??

बता दें फूलदेई केवल एक त्यौहार नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति आभार नव वर्ष का स्वागत और सामूहिक मंगल कामना की एक जीवंत परंपरा है, जो पहाड़ की संस्कृति और मौसम का अपना उत्सव मानी जाती है। फूलदेई का पर्व कहीं एक दिन कहीं 8 दिन और कुछ जगह पर पूरे चैत्र महीने तक चलता है। फूलदेई चैत्र मास की प्रथम संक्रांति अर्थात मीन संक्रांति को मनाया जाता है जो हर साल 14 या फिर 15 मार्च को पड़ता है। इसी दिन पहाड़ी और कैलेंडर के अनुसार हिंदू नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। कुमाऊं और गढ़वाल में इसे फूल संक्रांति जबकि जौनसार में इसे गोगा कहा जाता है। बसंत ऋतु में जंगलों और आंगन में प्योंली, बुरांश सरसों और आडू जैसे फूल खिल उठते है। तब बच्चे इन्हीं फूलों से घर की देरी सजाकर गीत गाते हैं।

“फूलदेई छम्मा देई,
दैणी द्वार भर भकार।”

राजकुमारी प्योली की कथा से जुड़ा है त्यौहार

लोक कथा के अनुसार ऐसा कहा जाता है की प्योली नाम की एक राजकुमारी जंगल में रहती थी जो प्रकृति से बेहद प्रेम करती थी। जब उसका विवाह दूर देश में हुआ तो वह अपने जंगल और पहाड़ों की याद में बीमार पड़ गई और दुनिया को छोड़ कर चली गई। मगर प्योली की आखिरी इच्छा थी कि उसे उसके प्रिय पहाड़ों के बीच दफनाया जाए, कहा जाता है कि उसकी समाधि पर कुछ दिन बाद एक सुंदर पीला फूल खिला जिसे लोगों ने प्यार से प्योंली नाम दिया और उसे हर घर की दहलीज पर चढाया। कहते हैं कि तभी से पहाड़ों में फूलदेई की शुरुआत हुई।

फूलदेई का महत्व

बताते चले फूलदेई वाले दिन सर्दियों का अंत और बुआई के मौसम की शुरुआत मानी जाती है। इसी दिन से कुमाऊं में भिटोली देने की परंपरा भी शुरू हो जाती है ,जिसमे भाई अथवा माता-पिता अपनी विवाहित बहनों बेटियों के लिए उपहार के रूप में नए वस्त्र और मायके से पकवान बनाकर ले जाते हैं।

फूलदेई के दिन बनते है खास पकवान

फूलदेई के अवसर पर एक खास हलवा तैयार किया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में साई कहा जाता है। यह चावल और गुड़ से तैयार किया जाता है जिसे प्रसाद के रूप में आस पड़ोस में भी बांटा जाता है।

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