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बैतडी: पं. गणेश प्रसाद पंत का 27 वर्षों का मिशन, दलित बस्तियों तक पहुंचा रहे वैदिक संस्कार
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|Pandit Ganesh Prasad Pant | Nepal News | Vedic Rituals | Social Harmony | Caste Discrimination | Dalit Welfare| 27 वर्षों से दलित बस्तियों में वैदिक संस्कारों की ज्योति जगा रहे पं. गणेश प्रसाद पंत, सामाजिक समरसता का बने प्रतीक
|Pandit Ganesh Prasad Pant | Nepal News | Vedic Rituals | Social Harmony | Caste Discrimination | Dalit Welfare| सामाजिक समानता और धार्मिक समरसता को मजबूत करने की दिशा में नेपाल के बैतडी जिले के पाटन नगरपालिका-8, खोड्पे-जसुलीखाली निवासी राजज्योतिषी पंडित गणेश प्रसाद पंत पिछले 27 वर्षों से एक अनोखा अभियान चला रहे हैं। वे दलित बस्तियों में जाकर वैदिक परंपराओं के अनुसार धार्मिक संस्कार और अनुष्ठान संपन्न कराते हैं तथा समाज में फैले जातीय भेदभाव और छुआछूत जैसी कुरीतियों को समाप्त करने का संदेश दे रहे हैं।
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27 वर्षों से जारी सामाजिक जागरूकता का अभियान
(Social Harmony Campaign)
पंडित गणेश प्रसाद पंत का कहना है कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य समाज को जोड़ना है, न कि जाति या वर्ग के आधार पर विभाजित करना। इसी सोच के साथ उन्होंने वर्षों पहले दलित समुदाय तक वैदिक संस्कारों को पहुंचाने का संकल्प लिया। वे स्वयं दलित परिवारों के घर जाकर धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं और उनके साथ भोजन कर सामाजिक समानता का संदेश भी देते हैं।
411 से अधिक प्रकार के वैदिक अनुष्ठानों का कराया आयोजन
(Vedic Rituals)
पंडित पंत के अनुसार अब तक उन्होंने 411 से अधिक प्रकार के वैदिक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए हैं। इनमें 38 श्रीमद्भागवत सप्ताह, 24 शिवपुराण कथाएं, 297 लघुरुद्राभिषेक, 189 महारुद्राभिषेक, 3,911 नामकरण संस्कार, 567 उपनयन (व्रतबंध), अनेक वैदिक विवाह, 722 श्री सत्यनारायण पूजा, 622 ग्रहशांति, 39 शतचंडी महायज्ञ, 62 अखंड रामायण पाठ, 579 स्वस्थानी व्रतकथा, 55 त्रिपिंडी श्राद्ध और 79 गरुड़ पुराण अनुष्ठान शामिल हैं।
हजारों लोगों को वैदिक परंपरा से जोड़ा
(Dalit Empowerment)
सामाजिक समरसता के अपने अभियान के तहत उन्होंने 1,687 शिल्पी (दलित) समुदाय के लोगों को यज्ञोपवीत धारण कराया, जबकि 411 दलित महिलाओं को धार्मिक परंपरा के अनुसार पवित्र दोरक धारण कराया। उनके अनुसार यह कदम समाज में समान धार्मिक अधिकार सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।
धर्म में भेदभाव के लिए नहीं है कोई स्थान
(Religious Equality)
पंडित गणेश प्रसाद पंत का मानना है कि वेद, उपनिषद, पुराण और प्रामाणिक धर्मशास्त्र किसी भी व्यक्ति के साथ जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देते। उनका कहना है कि धर्म के नाम पर फैली छुआछूत, छाउपड़ी प्रथा और जातीय भेदभाव जैसी कुरीतियों को समाप्त करना धार्मिक नेतृत्व की नैतिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने बताया कि सुदूर पश्चिम नेपाल के कई इलाकों में आज भी दलित परिवारों के यहां विवाह, नामकरण, उपनयन और अन्य धार्मिक संस्कार कराने से कुछ लोग परहेज करते हैं। यहां तक कि श्मशान घाटों में भी जातीय भेदभाव देखने को मिलता है। इन्हीं सामाजिक विसंगतियों को दूर करने के उद्देश्य से उन्होंने यह अभियान शुरू किया।
अथर्ववेद को लेकर फैली भ्रांतियों पर भी रखी राय
(Atharva Veda)
पंडित पंत ने कहा कि अथर्ववेद को तथाकथित “दलितों का वेद” कहकर अपमानित करना धर्म और वैदिक परंपरा दोनों का अपमान है। उनका मानना है कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक की कई अवधारणाओं की प्रेरणा अथर्ववेद में निहित ज्ञान से जुड़ी हुई है। इसलिए किसी भी वेद का अपमान उचित नहीं है।
अभियान के कारण झेलीं कठिनाइयाँ, फिर भी नहीं छोड़ा संकल्प
(Social Reform)
उन्होंने बताया कि दलित बस्तियों में वैदिक कर्मकांड शुरू करने के बाद उनके पूर्वजों के समय से जुड़े 575 पारंपरिक यजमान उनसे अलग हो गए। इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी उन्हें अपमानजनक टिप्पणियों और गाली-गलौज का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपने अभियान को नहीं छोड़ा।
उनका कहना है कि “मैं अपने धर्म, अपने कर्तव्य और अपने वैदिक सिद्धांतों से कभी विचलित नहीं हुआ। समाज में समानता स्थापित करना ही मेरा संकल्प है।”
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जातीय भेदभाव पर सख्त कानून की मांग
(Caste Discrimination)
पंडित गणेश प्रसाद पंत ने जातीय भेदभाव करने वालों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की मांग की। उनका कहना है कि समाज जिन शिल्पकारों द्वारा बनाए गए घरों, औजारों, वाहनों और आधुनिक संसाधनों का उपयोग करता है, उन्हीं के साथ भेदभाव करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि केवल सवर्ण समाज ही नहीं, बल्कि दलित समुदाय के भीतर मौजूद आपसी भेदभाव भी समाप्त होना चाहिए।
घर-घर वैदिक संस्कृति पहुंचाने का संकल्प
(Vedic Culture)
पंडित पंत का लक्ष्य प्रत्येक हिंदू परिवार में वेद, पुराण, शालिग्राम, तुलसी, शंख, घंटा और पंचायतन देवताओं की विधिवत स्थापना कर वैदिक संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाना है। उनका मानना है कि धर्म सभी के लिए समान है और हर व्यक्ति को धार्मिक अधिकारों तथा वैदिक संस्कारों में समान सहभागिता मिलनी चाहिए।
