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फोटो - मंजू आर साह, (अल्मोड़ा उत्तराखंड -देवभूमि दर्शन)

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उत्तराखंड की ‘पिरूल वुमेन’ मंजू आर साह हस्तशिल्प कला से संवार रही पहाड़ की महिलाओं का जीवन

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Manju Sah Pirul women: जानिए उत्तराखंड की पिरुल वूमेन मंजू आर साह के बारे में, जिन्होंने इसके हस्तशिल्प उत्पादों को देश-विदेश तक दी पहचान…

Manju Sah Pirul women
एक और जहां उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों के अधिकांश युवा रोजगार की तलाश में बड़े शहरों एवं दूसरे राज्यों का रूख करने को मजबूर हैं वहीं राज्य के कुछ होनहार युवा, बेटियां और महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से पहाड़ में स्वरोजगार की अलख जगाई है। आज हम आपको राज्य की एक ऐसी मेहनतकश महिला से रूबरू कराने जा रहे हैं जिन्होंने बेकार और दावाग्नि का सबसे बड़ा कारण समझे जाने वाले पिरूल से बेहतरीन उत्पाद बनाकर न केवल स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ाए हैं बल्कि उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों के साथ ही क‌ई अन्य राज्यों की महिलाओं को भी इसका प्रशिक्षण देकर आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का काम किया है।
(Manju Sah Pirul women)
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Manju Sah Pirul women
जी हां…बात हो रही है ‘ उत्तराखण्ड की पिरूल वुमेन’ के नाम से मशहूर मंजू आर साह की, जिनके बनाए उत्पादों की उत्तराखंड ही नहीं देश विदेश में भी भारी डिमांड है। बात मंजू के व्यक्तिगत जीवन की करें तो 9 अगस्त 1984 को बागेश्वर के असों (कपकोट) गांव में किशन सिंह रौतेला और देवकी रौतेला के घर जन्मी मंजू ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अपने गांव से ही प्राप्त की। जिसके बाद उन्होंने कपकोट से इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत शोभन सिंह जीना कैम्पस से बीए, एम. बी. कॉलेज हल्द्वानी से एमए, भीमताल के जे. एन. कॉल इन्स्टीट्यूट से बीएड की डिग्री हासिल की। जिसके पश्चात वर्ष 2009 में उनका विवाह मनीष कुमार साह के साथ हुआ, जिसके उपरांत वह अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट के हाट गांव में आकर रहने लगीं। इसी दौरान उनकी मौसेरी बहन पूजा ने उन्हें साज सज्जा के सामान बनाने हेतु प्रेरित किया। बचपन से ही वेस्ट से बेस्ट बनाने का शौक रखने वाली मंजू ने इसके बाद वर्ष 2010 से पिरूल के उत्पाद बनाने शुरू कर दिए।
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देवभूमि दर्शन से खास बातचीत:- Manju R Sah Uttarakhand
अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए मंजू ने देवभूमि दर्शन से बातचीत में बताया कि पहाड़ में हर जगह पिरूल (चीड़ की पत्तियाँ) फैली रहती है। जिन्हें अंगरेजी में पाइन नीडल Pine Needle कहा जाता है और उसका कहीं कोई इस्तेमाल नहीं होता। यहां तक कि इसे वनों में लगने वाली आग का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। इसी पिरूल का सदुपयोग करने के उद्देश्य से उन्होंने इसे इकठ्ठा करना शुरु किया। जिसके बाद वह इससे फूलदान, टोकरी, कटोरी इत्यादि बनाने लगी. इसके बाद उन्होंने पिरूल की गोल हैट, बैठने के आसन, पायदान बनाने भी शुरु किये। उनका सफर यही नहीं रूका, उन्होंने पिरूल का उपयोग कर खूबसूरत राखियां भी बनानी शुरू कर दी। इतना ही नहीं उन्होंने अपने गांव की अन्य महिलाओं को भी इसका प्रशिक्षण दिया। परिवार की आर्थिक स्थिति को और अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए उन्होंने अन्य जगह नौकरी करने का भी निर्णय लिया। उपनल के द्वारा जब उन्हें राजकीय बालिका इंटर कालेज ताडीखेत में बतौर प्रयोगशाला सहायक नियुक्ति मिली तो उन्होंने स्कूल की शिक्षिकाओं और छात्राओं को भी पिरूल से बनने वाले सजावट के सामान को बनाने के गुर सिखाये।
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उनके इन अथक प्रयासों से जहां गांव की क‌ई अन्य महिलाएं और बेटियां अपनी आर्थिक स्थिति को सबल बना रही है वहीं उन्होंने हिमाचल, झारखंड जैसे अनेक दूसरे राज्यों की महिलाओं को भी इस दिशा में प्रेरित करने का काम भी किया है। उनकी इस अभिनव पहल के लिए मंजू को शिक्षा में शून्य निवेश नवाचार हेतु प्रशस्ति पत्र भी दिया गया। कुल मिलाकर उन्होंने पिरूल को स्वरोजगार से जोड़कर पहाड़ के लोगों के लिये स्वरोजगार का एक नवीन विकल्प बनाने की शुरुआत की है। यहीं कारण है कि आज उनके नक्शे कदम पर चलते हुए राज्य की क‌ई अन्य महिलाएं भी पिरूल के उत्पाद बनाने लगी है। खासतौर पर रक्षाबंधन पर महिलाओं द्वारा बनाई जा रही राखियों को लोगों द्वारा हाथों-हाथ लिया जा रहा है। बता दें कि मंजू को इण्डिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल की ओर से वर्ष 2019 में कोलकाता में बेस्ट अपकमिंग आर्टिस्ट के अवार्ड से भी नवाजा गया है।
(Manju R Sah Uttarakhand)
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अपनी इस अभूतपूर्व उपलब्धि का सर्वाधिक श्रेय गौरीशंकर कांडपाल को देने वाली मंजू उनके बारे में कहती हैं कि “मुझे पिरुल से पहचान दिलाने में गौरीशंकर कांडपाल जी का महत्वपूर्ण योगदान है उन्होंने ही मुझे वर्ष 2018 से निरंतर फोर्स किया कि इस काम को आगे करो।” आपको बता दें कि मंजू ने यह अभूतपूर्व उपलब्धि बचपन में उन पर टूटे दुखों के बावजूद हासिल की है। दरअसल जब वह महज तीसरी कक्षा में पढ़ती थी तो उसी दौरान वर्ष 1993 में उनके प्रधानाचार्य पिता किशन सिंह रौतेला का असमय निधन हो गया। उस समय मंजू बुरी तरह टूट गई थी। परंतु इतनी छोटी सी उम्र में टूटे दुखों के इस पहाड़ ने न केवल उन्हें काफी मजबूत बनाया बल्कि नन्ही सी उम्र में ही जिम्मेदारियों का बोझ उठाना भी सिखाया। यहीं कारण है कि वह आज अनेक महिलाओं की प्रेरणास्त्रोत बनकर उभरीं है।

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