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Satish basnuwal poem
फोटो देवभूमि दर्शन Satish basnuwal poem

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गढ़वाली कविता- “यकुलाँस……” सतीश बस्नुवाल (काव्य संकलन देवभूमि दर्शन)

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Satish basnuwal poem: यह कविता एक ऐसे 80 वर्षीय बुजुर्ग व्यक्ति की कहानी है, जिनका पूरा गाँव पलायन कर चुका है, और अब वह पूरे गाँव मे अकेले रहते हैं, लेकिन उनकी दिनचर्या व कार्यशैली आज भी वैसी ही है जैसे आज से 30 वर्ष पहले थी | वह अपने आप मे खुश व संतुष्ट है, लेकिन उनकी सिर्फ एक ही पीडा़ है और वह है -अकेलापन,, अर्थात “”यकुलाँस””

जब तक चलदि साँस,
तब तक आस रै जान्द,
दिन ता कटि ही जान्द लाटा,
व्यखुनि बगत यकुलाँस ह्वै जान्द
सुवेर पन्देरा मा मारी लपाक
हाथ मुख पर पाणी छपाक
गिलास भोरी च्या पीण
दगडा़ मा मारी गूडा़ कटाक |
चटणि मा बासी रवटि चपै की
सरा शरेल मा मिठास ह्वै जान्द
दिन ता कटि ही जान्द लाटा,
व्यखुनि बगत यकुलाँस ह्वै जान्द
म्वाला मुखर घाण्डी खाँखर
दौंली बान्धी बल्दू फर
सफेद कुर्ता काली फथकी
भ्यूँला कि सिटुकी हाथ फर
बीज कुछ भी बुतन्दू लाटा
पर फुगंडू़ मा घास ह्वै जान्द
दिन ता कटि ही जान्द लाटा,
व्यखुनि बगत यकुलाँस ह्वै जान्द
अजि भि मि यखुली गोर चरान्दू
झुल्लू अगेला न साफी जगान्दू
बस छतलूं लांठू दगड़्या म्यारा
अफी पकान्दू अफी ही खान्दू
यखुली जिकुडा़ रूड़ प्वडी़ रैन्द
आँख्यू मा चौमास ह्वै जान्द
दिन ता कटि ही जान्द लाटा,
व्यखुनि बगत यकुलाँस ह्वै जान्द
हुक्का सजद चिलम भि बजद
बरसि मा दिनभर आग भि जगद,
यखुलि यखुलि बैठ्यूँ रैन्दू
चौंतरा मा अब कछडी़ नि लगद,
यखुलि यखुलि तम्बाकु खै-खै की
जिकुडी़ मा अब स्वाँस ह्वै जान्द
दिन ता कटि ही जान्द लाटा,
व्यखुनि बगत यकुलाँस ह्वै जान्द
राति खुणि स्वीणा नि आन्दा
भूत पिचास भि अब नि डरान्दा
बाच कखि कैकी कभि नि सुणेन्दी
लोग नि दिख्याँ महीनौ ह्वै जान्दा
खटुलि मा टुप पोडि़की सोचदू
कुजणि कब स्वर्गवास ह्वै जान्द
दिन ता कटि ही जान्द लाटा,
व्यखुनि बगत यकुलाँस ह्वै जान्द |
एक नौनू दिल्ली हैंकु बंगलौर
बेटी भि परदेश अपणा अपणा ठौर,
बुढडी़ म्वर्याँ पाँच साल ह्वैगी
तब बटि यखुलि मि घौर
पुरणा दिनों थै सोचि सोचि कभि
यू मन भारी उदास ह्वै जान्द
दिन ता कटि ही जान्द लाटा,
व्यखुनि बगत यकुलाँस ह्वै जान्द |
फोन कना रैन्दि नाती- नतेणा
मीथै बुलाणा मीथै भटेणा,
पर मि कनक्वै छोडि़ कि चलि जौं
म्यरा पुरण्यों का फाँगा बंझेणा,
वूँका एसी वला फ्लैटों मा
मैकू ता वनबास ह्वै जान्द
दिन ता कटि ही जान्द लाटा,
व्यखुनि बगत यकुलाँस ह्वै जान्द |
जीवन की चा या सच्चाई
जैन भि मंथा मा जन्म पाई,
सब्बि धाणि यखि रै जान्द
मनखि खाली आई खाली गाई,
पर मोह-माया तब छुटदी लाटा
जब यु शरैल लांश ह्वै जान्द |
दिन ता कटि ही जान्द लाटा,
व्यखुनि बगत यकुलाँस ह्वै जान्द ||
रूमुक बगत यकुलाँस ह्वै जान्द ||
रचना- सतीश बस्नुवाल, पोस्ट आफिस दिगोलीखाल, तहसील धुमाकोट, ब्लाक- नैनीडाण्डा, जिला -पौडी़ गढ़वाल (उत्तराखण्ड) पिन- 246277
Satish basnuwal poem

यह भी पढ़ें- गढ़वाली कविता- “एक छै पहाड़……” कृष्ण चन्द्र (काव्य संकलन देवभूमि दर्शन)

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