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गढ़वाली कविता- “एक छै पहाड़……” कृष्ण चन्द्र (काव्य संकलन देवभूमि दर्शन)

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गढवाली कविता- एक छै पहाड़….krishna chandra poem

एक छै पहाड़।
जख छै गाड़ और दादा-दादी क़ प्यार।।
उन पहाड़ो मा एक छै घर, जो छै म्यार।
त यस छै म्यार पहाड़, ओ मेर यार।।
एक छै पहाड़।
जख छ़ मिट्टू पाणी और लोगूक मिट्ठी वाणी।।
इन पहाड़ों में छु शुद्ध हवा और शुद्ध ख्याणी।
और इन ही पहाड़ों में बसि छन म्यार प्राणि।।
एक छै पहाड़।
जख छै लोगू म प्यार, पर नि छै वख विकास।।
आज इन पहाडो़ मा खेती-बाड़ी क भी हो गय नाश ।
और विकास न हुण कारणल इन पहाडो़ बै लोगूल कर यल प्रवास।।
एक छै पहाड़।
जख नि रै गी लोग और लोगूक घर बार।।
पहाड़ की पीड़ा दादा-दादी से पूछा, जिनूल अपर परिवार दग्यण मन्यै हर त्यौहार।
विरान पहाड़ यू छन बौल्णना कि अब त घर आ जा मयर यार।।
रचना- कृष्ण चन्द्र, ग्राम- तिमलखेत, पोस्ट आफिस – जयंतेश्वर, पिन कोड – 263661, विकासखण्ड स्याल्दे, जिला- अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड)
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