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अल्मोड़ा : मुझोली की लक्ष्मी परिहार का ऐपण कला में ऐसा हुनर, देश-विदेश तक पहुंच रहे उत्पाद
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|Laxmi Parihar Aipan work |Aipan Art Uttarakhand| अल्मोड़ा की बेटी लक्ष्मी परिहार ऐपण कला के जरिए बिखेर रहीं उत्तराखंड की संस्कृति की चमक, देश-विदेश तक पहुंच रहे हस्तनिर्मित उत्पाद
|Laxmi Parihar Aipan work |Aipan Art Uttarakhand| उत्तराखंड की पारंपरिक लोक कला ऐपण को नई पहचान दिलाने में युवा पीढ़ी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अल्मोड़ा जिले के दूरस्थ गांव मुझोली की रहने वाली लक्ष्मी परिहार आज अपनी मेहनत और हुनर के दम पर न केवल पारंपरिक ऐपण कला को जीवित रखे हुए हैं, बल्कि इसे देश और विदेश तक पहुंचाने का काम भी कर रही हैं। उनके हाथों से तैयार किए गए ऐपण उत्पाद आज ऑस्ट्रेलिया समेत देश के कई राज्यों और शहरों तक पहुंच चुके हैं।
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(पारंपरिक Folk Art को दे रहीं नई पहचान) | Aipan Art Uttarakhand
अल्मोड़ा जिले के मुझोली गांव, पोस्ट ऑफिस गोलूछीना की निवासी लक्ष्मी परिहार एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके पिता ललित परिहार कृषि, पशुपालन और आटा चक्की के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं, जबकि माता मंजू परिहार कृषि एवं पशुपालन के साथ-साथ एक गैर सरकारी संस्था (NGO) से जुड़कर बुनाई का कार्य भी करती हैं।
देवभूमि दर्शन से खास बातचीत में लक्ष्मी बताती हैं कि बचपन से ही उन्होंने अपनी मां और गांव की बड़ी दीदियों को त्योहारों और शुभ अवसरों पर ऐपण बनाते हुए देखा। यही देखकर उनकी भी इस पारंपरिक कला में रुचि बढ़ी और धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं ऐपण बनाना शुरू कर दिया। कला के प्रति उनका लगाव बचपन से ही रहा है, जिसने आगे चलकर उन्हें इस क्षेत्र में पहचान दिलाई।

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(दो वर्षों से कर रहीं Aipan Products का निर्माण) (Aipan art work by Laxmi Parihar)
लक्ष्मी परिहार पिछले लगभग दो वर्षों से ऐपण कला से जुड़े विभिन्न उत्पाद तैयार कर रही हैं। उनके द्वारा बनाए जाने वाले उत्पादों में पूजा थाली और कलश, ऐपण फ्रेम, ऐपण नेमप्लेट, की-चेन (चाभी के छल्ले), ऐपण तोरण, सजावटी घड़ियां और अन्य हस्तनिर्मित वस्तुएं शामिल हैं।
उनकी कला केवल उत्पादों तक सीमित नहीं है। लक्ष्मी अपने गांव के मंदिरों में मूर्तियों के सौंदर्यीकरण और ऐपण सजावट का कार्य भी कर चुकी हैं। इसके अलावा गांव के समीप स्थित एक होमस्टे में भी उन्होंने ऐपण कला के माध्यम से पारंपरिक सजावट का काम किया है, जिसे लोगों ने काफी सराहा।
(देश-विदेश तक पहुंच रही उत्तराखंड की कला) | Women Entrepreneurship
लक्ष्मी के हाथों से तैयार किए गए ऐपण उत्पाद आज उत्तराखंड के कई जिलों के अलावा देश और विदेश तक अपनी पहचान बना चुके हैं। उनके उत्पाद ऑस्ट्रेलिया, अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, हल्द्वानी, बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और चमोली जैसे क्षेत्रों तक पहुंच चुके हैं।
यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि यदि स्थानीय कला को सही दिशा और मंच मिले तो वह वैश्विक स्तर तक अपनी पहचान बना सकती है। लक्ष्मी का प्रयास उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी माध्यम बन रहा है।
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(आत्मनिर्भरता की मिसाल बनीं लक्ष्मी) | Women Success Story
वर्तमान में लक्ष्मी परिहार अपने घर में अकेले ही इस कार्य को आगे बढ़ा रही हैं। परिवार का सहयोग और अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने ऐपण कला को रोजगार और पहचान दोनों का माध्यम बनाया है। उनकी सफलता ग्रामीण क्षेत्रों की उन युवतियों के लिए प्रेरणा है जो अपनी पारंपरिक कला और हुनर के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने का सपना देख रही हैं।
लक्ष्मी परिहार की कहानी यह साबित करती है कि यदि जुनून, मेहनत और अपनी संस्कृति के प्रति प्रेम हो तो गांव की एक साधारण बेटी भी अपनी कला के दम पर देश-विदेश में पहचान बना सकती है।
