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Uttarakhand: success story of Anju Bisht from almora who lost his eyesight.

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उत्तराखंड: हादसे में आंखों की रोशनी चली गई लेकिन कड़ी मेहनत से अंजू बिष्ट ने पाईं अपनी मंजिल

Uttarakhand: आंखों की रोशनी चली जाने के बावजूद दिव्यांग अंजू बिष्ट (Anju Bisht) ने नहीं हारी हिम्मत, कड़ी मेहनत के बलबूते हासिल किया मुकाम..

“सीढ़ियां उन्हे मुबारक हो जिन्हे छत तक जाना है;
मेरी मंज़िल तो आसमान है रास्ता मुझे खुद बनाना है।”
इन चंद पंक्तियों को एक बार फिर सही साबित कर दिखाया है देवभूमि उत्तराखंड (Uttarakhand) की एक और साहसी, होनहार एवं परिस्थितियों से बिल्कुल ना घबराने वाली बहादुर बेटी ने। जी हां.. हम बात कर रहे हैं राज्य के अल्मोड़ा जिले की रहने वाली अंजू बिष्ट (Anju Bisht) की, जिनके संघर्षशील जीवन पर यह पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती है। बता दें कि हाईस्कूल पास करने के उपरांत एक हादसे में अंजू की दोनों आंखों की रोशनी चली गई परंतु बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और ब्रेल लिपि के माध्यम से अपनी पढ़ाई जारी रखकर न सिर्फ अपने सपनों को साकार किया बल्कि डीएलएड करने के बाद अब वह नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड (नैब) संस्था में दृष्टि दिव्यांग बच्चों को पढ़ाकर उनके अंधकारमय जीवन में भी शिक्षा का उजियारा भर रही है। अंजू के इस संघर्षशील जीवन की यह कहानी जहां एक ओर राज्य के अन्य युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए काफी हैं वहीं अंजू उन युवाओं के लिए भी एक नायाब उदाहरण है जो थोड़ी सी विपरीत परिस्थितियों में ही हार मान लेते हैं। अंजू के इस साहस, मेहनत और लगन की आज हर कोई तारीफ़ कर रहा हैं।
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वर्तमान में ब्रेल लिपि से बीए की पढ़ाई करने के साथ ही कक्षा एक से आठवीं तक के बच्चों को भी पढ़ा रही है अंजू:-

प्राप्त जानकारी के अनुसार मूल रूप से राज्य के अल्मोड़ा जिले के माल गांव निवासी अंजू बिष्ट ने वर्ष 2013 में जीजीआईसी से हाईस्कूल पास किया। बचपन से मन लगाकर पढाई करने वाली अंजू हाईस्कूल की परीक्षा देकर काफी खुश थी परंतु इसके बाद हुए एक हादसे ने अंजू की जिंदगी को पूरी तरह बदलकर रख दिया। अब अंजू के जीवन में चारों ओर अंधियारा छा गया था। हादसे में उसकी दोनों आंखों की रोशनी जा चुकी थी। बेटी की आंखों की रोशनी जाने से चिंतित परिजनों ने अंजू का विभिन्न अस्पतालों में इलाज करवाया। यहां तक कि परिजन अंजू को इलाज के लिए दिल्ली एम्स भी लेकर ग‌ए परंतु कोई फायदा नहीं हुआ। आंखों की रोशनी चलें जाने से अंजू को करीब दो वर्ष तक घर पर ही रहना पड़ा। एक बार के लिए तो ऐसा लगा कि अब अंजू की पढ़ाई हमेशा के लिए छूट जाएगी परंतु 2015 में गौलापार हल्द्वानी स्थित नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड (नैब) संस्था के संपर्क में आने पर अंजू को एक बार फिर आगे की पढ़ाई के लिए उम्मीद की किरण दिखाई दी। पहले उन्होंने नैब में ब्रेल लिपि सीखी और फिर जीजीआईसी हल्द्वानी से इंटर की परीक्षा ब्रेल लिपि के माध्यम से उत्तीर्ण की। तदोपरांत उन्होंने मुंबई से दो साल का डीएलएड कोर्स किया। वर्तमान में अंजू उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय (यूओयू) से ब्रेल लिपि से बीए की पढ़ाई करने के साथ ही नैब में कक्षा एक से आठवीं तक के बच्चों को भी पढ़ा रही हैं।

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